Thursday, 26 January 2017

धुँआ आता क्यों नहीं?

मेरी नींद, उससे जगाता सपनो का शोर
इतनी भीड़ में ही खो गए हैं कहीं
चाँद सितारे जो सब थे आसमान में
इतनी जागी आखों में खो गए हैं कहीं

मेरे बेकरार सपनो ने उनसे पूछा
अब तू सोती भी है की नहीं?
उसी रोज मैंने जाग कर देखा
की अब रात होती हैं भी है की नहीं!

मंदिर-मस्जिद सब बना दिया है
न जाने अब भी खुदा आता क्यों नहीं!
रात बस कालिख है, मैंने दिन जला दिए हैं
न जाने अब भी धुंआ आता क्यों नहीं!

इस शहर में मैं रहता हूँ,लोहे सा सवेरा है
फासला आज से, यहाँ कल का बसेरा है
गगन को काटती, एक पिघलती शाम है,
ईमान की भी नियत यहाँ, बेइमान है!

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