दिल्ली के बस स्टैंड के पीछे
पार्क में बेचें हैं। बेचों पर बेघर सोते हैं। बेघर हैं और घर नहीं। फूल है खुशबू नहीं। चेहरे हैं, मुस्कुराहट भी है। रास्ते का नाम है, लक्ष्य गुमनाम है।
दिल्ली के बस स्टैंड पर
पराठे खाते हुए एक गुर्जर भाई ने बताया की उनके ताऊ दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन से उतरे और वापस ट्रेन में बैठ कर गांव चले गए। गांव जाकर टेलीफोन कर बताया कि दिल्ली में भगदड़ मच चुकी है। यह उन शहरों की राजधानी है जहां भगदड़ मचती है। गोपनीय सूत्रों से पता चला है की अब ताऊ ट्रेन की भीड़ देख कर ही भगदड़ समझते हैं।
बस (410)
रास्ते का नाम है, लक्ष्य गुमनाम है। स्कीम के नाम हैं, लाभार्थी गुमनाम है। ठीक विज्ञापन के पीछे का आदमी। वही विज्ञापन जो बस स्टैंड पर होता है, और होता है उसके पीछे का आदमी।
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