Thursday, 26 January 2017

धुँआ आता क्यों नहीं?

मेरी नींद, उससे जगाता सपनो का शोर
इतनी भीड़ में ही खो गए हैं कहीं
चाँद सितारे जो सब थे आसमान में
इतनी जागी आखों में खो गए हैं कहीं

मेरे बेकरार सपनो ने उनसे पूछा
अब तू सोती भी है की नहीं?
उसी रोज मैंने जाग कर देखा
की अब रात होती हैं भी है की नहीं!

मंदिर-मस्जिद सब बना दिया है
न जाने अब भी खुदा आता क्यों नहीं!
रात बस कालिख है, मैंने दिन जला दिए हैं
न जाने अब भी धुंआ आता क्यों नहीं!

इस शहर में मैं रहता हूँ,लोहे सा सवेरा है
फासला आज से, यहाँ कल का बसेरा है
गगन को काटती, एक पिघलती शाम है,
ईमान की भी नियत यहाँ, बेइमान है!

पिंजरा

हवा का पिंजरा,  मेरे संसार का प्रतिरूप
मैं गिरने के डर से, पंख पसारने को डरता हूँ
शाम के आगोश में जैसे सूरज की रवानगी,
मैं पिघलने के डर से, सरेआम जलने से डरता हूँ!

एक पुष्प की गत में होती जो अनिश्चिता
मैं रोंदे जाने की डर से, खिलने से डरता हूँ
एक भय है की मेरी आवाज़ पहुचेगी नहीं,
सब से सुनने के डर से, मैं बोलने से डरता हूँ !

एक आईने में धुप छिटक कर टूट पड़ी है
सपने टूटने के डर से, मैं सोने से डरता हूँ
पतंगे की जाँ, इश्क की कीमत-अदायगी
कुछ खोने के डर , मैं पाने से डरता हूँ!

एक ख्वाब है जो मर्यादा में मीलों दूर भटकता है
उस ख्वाब की सोहबत में, लड़खड़ाने से डरता हूँ
कुछ यार कहते हैं की मैं बोलता क्यों नहीं?
सशब्द निरर्थकता की भीर में मिल जाने से डरता हूँ!

मायका

हम सब बेटी हैं, और दुनिया एक मायका
संसार की दावत में, मैं महज एक जायका
बस रेत हूँ मैं इस तट पे, दे दो लाखों नाम
अनेक लहरें मिटाती, ये नाम तमाम!

निजी संपत्ति क्या है अनिश्चित ब्रह्मांड में?
निजी शरीर मेरा, कुछ लकड़ी शमशान में!
सालों छाती भर भर के दम लेता हूँ
जीने के लिए बेकार ही जोखिम लेता हूँ!

हाथ सनी अंगूठीयों में, दम घोटता सोना
इंसानों की जद्दोजहज में भगवान का रोना
घेर के जमीन को, स्वतंत्र जीने की लालसा
धरती को नंगा करने की मासूम सी आकांशा!

मैं बेकार रोता हूँ, दुनिया बहुत खूबसूरत है
गरिमा, प्रेम, विरासत, सभ्यता की मूरत है
दोषमुक्ति की जरुरत नहीं, रोश कहाँ नहीं?
आत्म-शुद्धि व्यर्थ है, दोष कहाँ नहीं?

बस एक बात बता दो ये जमीन किसकी है?
भगवान का कब्ज़ा है, की उनकी सत्ता खिसकी है?
एक बात बता दो की क्या हम रामगुलाम है?
जीने देना हलाल है की, की जीना हराम है?

उनकी अर्थी उठाई, जो दफनाये हुए से बड़े थे
कल तक यहीं रौब में उफनाये हुए से खरे थे!
मेरी पूछी सवालों का जवाब कल देना था उन्हें
बेखेत को मजदूरी, किसान को हल देना था उन्हें!

तो याद में आप अपने, महल छोर के जाना
बेघर इस धरती को और विकल छोर के जाना
पर मैं यहाँ कुछ छोर कर नहीं जाऊँगा, शायद
इसी उम्मीद में की सब-कुछ छोर कर जा रहा हूँ!

प्रतिबिम्ब

जग छुआ या अनछुआ, मन में प्रतिबिम्ब है,
आँखें खोलो तो हकीक़त, बंद करो तो नींद है।
विपरीत धरा में लक्ष्य खोजती, चकोर सी यह लालसा,
मन बेचैन उस तट पर, दिल को जहाँ सुकून है।

ढाचों में परे मेरे आडम्बर, मिट्टी में धरे मेरे भगवान,
निराकार रहे ये इश्वर पर, ढोंगों में परा है इंसान।
रोकर कैद हंसकर विच्छेद, लदकर हीरे में यथार्थ भेद।
पुष्पों के हार काटों के मुह, सोने का जिस्म मिट्टी की
रूह।

मेरे आने का आलेख, मेरी 'छाया' मेरा खुला द्वेष
दिन के जाने का आलेख, सूरी छाया, ढका भेस।
सुभह- शाम के भीतर, कीमत मेरी लगती है,
मेरे कल आने की बोली में, ये काली रात जगती है!

मैं विक्रेता मैं खरीदार, मैं बाज़ार, मैं बिकता भी!
मैं बेइमान, मैं ठगा हुआ, मैं हँसते जग में दीखता भी!
चिन्मयता में सुयोग्य मैं, कर्मठता में सबसे प्रबल,
वासनाओं से निरीह मैं, मैं इंसान नहीं मिथ्या सबल!

मैं कल आऊं या ना आऊं, मैं आज में सना हुआ
हकीक़त में जीता, पर अपने सपनो में बना हुआ।
जग छुआ या अनछुआ, मन में प्रतिबिम्ब है
आँखें खोलूं तो हकीक़त, बंद करूँ तो नींद है।

काल्पनिक ख़ामोशी

सुनो, एक रोज़ की बात बताता हूँ
गले में ज़रा सा सन्नाटा था 'उसके' और
उसकी ख़ामोशी बड़े हक से शोर मचा रही थी
मैं खामोशियों के पीछे चला जा रहा था।

जब तूफानी रातों में हवाओं के शोर का
मतलब निकालना मुश्किल हो जाता हैं |
तब जो सवाल है मेरे, भीतर के तूफ़ान जैसे
उनके जवाबों को मैं खामोशियों में खोजता हूँ!

खामोशियों को मैं अक्सर इकरार समझ लेता हूँ!
मैं बेबाक छेरता हूँ, की मेरे धारणा को चुनौती दें
किस नम्र चेतना से ग्रसित है उनकी ख़ामोशी
की मैं जो सत्य मान लूं, उन्हें वो मंजूर है!

वो मेरे होने की बुनियादी शर्त सी हो चुकी है
मेरा एक झूट और उसपे अनेक जलालत
एक झूट की सत्य मात्र 'एक' है, खामोश है
जैसे 'वो', मेरी कल्पना, सन्नाटे के शोर में लिप्त!

त्याग

अकेलापन किसी के न होंने का पर्याय नहीं है। 'कोई नहीं है' इसका मतलब यह है की उसके होने की अनुभूति महसूस की गई है, लहाज़ा यह केवल एक खालीपन है, उस जगह की जिसे छोड़ कर कोई चला गया है, मुमकिन है की यह खालीपन भर जायेगा, लोगों से या चीज़ों से।
अकेलापन उससे गहरी बात है। यह उस स्तर पर होता जब मैं लोगों से घिरा रहता हूँ, पर ख्याल उस भीर में पनाह नहीं पाते, वो न जाने किस संसार की पड़ताल में भटकते रहते है। इस मर्ज़ की दवा और लोग हो सकते है, और भीड़! कम से कम शुरुआत में तो ऐसा ही लगता है पर धीरे धीरे यह महसूस होता है की लोग ही जड़ है इसके। फिर कुछ वक़्त अपने साथ और सूनापन काटने दौड़ता है, दिन-हफ़्तों तक बस अपनी आवाज़ सुनना एक अंतर पैदा कर देता है, गृह युद्ध का माहौल पनप जाता है!
तो क्या इसका इलाज़ भीतर है या बाहर? या फिर है ही नहीं? काम करने की सलाह मिलती है, करता भी हूँ। पर क्या वो काम जो एक विचार से भाग कर विवशता में करना पड़ता है, क्या उसका महत्व होगा? क्या वह उस निहित विचारधारा से ग्रसित नहीं होगा? बिलकुल होगा!
मेरी आवश्यकता एक वैचारिक नाव से कूद कर विचारहीन समुन्द्र में कूदने की है, जो सही गलत से परे हो, जो प्रेम सा गहरा हो और ममता सा नर्म! यह अकेलापन सायद लाइलाज है, पर एक अंतहीन सागर में खो तो सकता है! जब मनुष्य बुरे विचार से परे नहीं हो पाता तो जरुरी है की वह हर विचार के अस्तित्व को ही नकार दे, एक वस्तु सा इस्तेमाल करे लोगों को और चीजों को और उनके पीछे और आगे के विचार को त्याग दे, फल को पेड़ से अलग कर दे, फसल को जड़ से।

P.S: यह भी महज एक विचार है, उन लाखों में जिसे मैं त्याग चूका हूँ!