Thursday, 26 January 2017

प्रतिबिम्ब

जग छुआ या अनछुआ, मन में प्रतिबिम्ब है,
आँखें खोलो तो हकीक़त, बंद करो तो नींद है।
विपरीत धरा में लक्ष्य खोजती, चकोर सी यह लालसा,
मन बेचैन उस तट पर, दिल को जहाँ सुकून है।

ढाचों में परे मेरे आडम्बर, मिट्टी में धरे मेरे भगवान,
निराकार रहे ये इश्वर पर, ढोंगों में परा है इंसान।
रोकर कैद हंसकर विच्छेद, लदकर हीरे में यथार्थ भेद।
पुष्पों के हार काटों के मुह, सोने का जिस्म मिट्टी की
रूह।

मेरे आने का आलेख, मेरी 'छाया' मेरा खुला द्वेष
दिन के जाने का आलेख, सूरी छाया, ढका भेस।
सुभह- शाम के भीतर, कीमत मेरी लगती है,
मेरे कल आने की बोली में, ये काली रात जगती है!

मैं विक्रेता मैं खरीदार, मैं बाज़ार, मैं बिकता भी!
मैं बेइमान, मैं ठगा हुआ, मैं हँसते जग में दीखता भी!
चिन्मयता में सुयोग्य मैं, कर्मठता में सबसे प्रबल,
वासनाओं से निरीह मैं, मैं इंसान नहीं मिथ्या सबल!

मैं कल आऊं या ना आऊं, मैं आज में सना हुआ
हकीक़त में जीता, पर अपने सपनो में बना हुआ।
जग छुआ या अनछुआ, मन में प्रतिबिम्ब है
आँखें खोलूं तो हकीक़त, बंद करूँ तो नींद है।

No comments:

Post a Comment