Thursday, 26 January 2017

त्याग

अकेलापन किसी के न होंने का पर्याय नहीं है। 'कोई नहीं है' इसका मतलब यह है की उसके होने की अनुभूति महसूस की गई है, लहाज़ा यह केवल एक खालीपन है, उस जगह की जिसे छोड़ कर कोई चला गया है, मुमकिन है की यह खालीपन भर जायेगा, लोगों से या चीज़ों से।
अकेलापन उससे गहरी बात है। यह उस स्तर पर होता जब मैं लोगों से घिरा रहता हूँ, पर ख्याल उस भीर में पनाह नहीं पाते, वो न जाने किस संसार की पड़ताल में भटकते रहते है। इस मर्ज़ की दवा और लोग हो सकते है, और भीड़! कम से कम शुरुआत में तो ऐसा ही लगता है पर धीरे धीरे यह महसूस होता है की लोग ही जड़ है इसके। फिर कुछ वक़्त अपने साथ और सूनापन काटने दौड़ता है, दिन-हफ़्तों तक बस अपनी आवाज़ सुनना एक अंतर पैदा कर देता है, गृह युद्ध का माहौल पनप जाता है!
तो क्या इसका इलाज़ भीतर है या बाहर? या फिर है ही नहीं? काम करने की सलाह मिलती है, करता भी हूँ। पर क्या वो काम जो एक विचार से भाग कर विवशता में करना पड़ता है, क्या उसका महत्व होगा? क्या वह उस निहित विचारधारा से ग्रसित नहीं होगा? बिलकुल होगा!
मेरी आवश्यकता एक वैचारिक नाव से कूद कर विचारहीन समुन्द्र में कूदने की है, जो सही गलत से परे हो, जो प्रेम सा गहरा हो और ममता सा नर्म! यह अकेलापन सायद लाइलाज है, पर एक अंतहीन सागर में खो तो सकता है! जब मनुष्य बुरे विचार से परे नहीं हो पाता तो जरुरी है की वह हर विचार के अस्तित्व को ही नकार दे, एक वस्तु सा इस्तेमाल करे लोगों को और चीजों को और उनके पीछे और आगे के विचार को त्याग दे, फल को पेड़ से अलग कर दे, फसल को जड़ से।

P.S: यह भी महज एक विचार है, उन लाखों में जिसे मैं त्याग चूका हूँ!

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