हवा का पिंजरा, मेरे संसार का प्रतिरूप
मैं गिरने के डर से, पंख पसारने को डरता हूँ
शाम के आगोश में जैसे सूरज की रवानगी,
मैं पिघलने के डर से, सरेआम जलने से डरता हूँ!
एक पुष्प की गत में होती जो अनिश्चिता
मैं रोंदे जाने की डर से, खिलने से डरता हूँ
एक भय है की मेरी आवाज़ पहुचेगी नहीं,
सब से सुनने के डर से, मैं बोलने से डरता हूँ !
एक आईने में धुप छिटक कर टूट पड़ी है
सपने टूटने के डर से, मैं सोने से डरता हूँ
पतंगे की जाँ, इश्क की कीमत-अदायगी
कुछ खोने के डर , मैं पाने से डरता हूँ!
एक ख्वाब है जो मर्यादा में मीलों दूर भटकता है
उस ख्वाब की सोहबत में, लड़खड़ाने से डरता हूँ
कुछ यार कहते हैं की मैं बोलता क्यों नहीं?
सशब्द निरर्थकता की भीर में मिल जाने से डरता हूँ!
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