Thursday, 26 January 2017

मायका

हम सब बेटी हैं, और दुनिया एक मायका
संसार की दावत में, मैं महज एक जायका
बस रेत हूँ मैं इस तट पे, दे दो लाखों नाम
अनेक लहरें मिटाती, ये नाम तमाम!

निजी संपत्ति क्या है अनिश्चित ब्रह्मांड में?
निजी शरीर मेरा, कुछ लकड़ी शमशान में!
सालों छाती भर भर के दम लेता हूँ
जीने के लिए बेकार ही जोखिम लेता हूँ!

हाथ सनी अंगूठीयों में, दम घोटता सोना
इंसानों की जद्दोजहज में भगवान का रोना
घेर के जमीन को, स्वतंत्र जीने की लालसा
धरती को नंगा करने की मासूम सी आकांशा!

मैं बेकार रोता हूँ, दुनिया बहुत खूबसूरत है
गरिमा, प्रेम, विरासत, सभ्यता की मूरत है
दोषमुक्ति की जरुरत नहीं, रोश कहाँ नहीं?
आत्म-शुद्धि व्यर्थ है, दोष कहाँ नहीं?

बस एक बात बता दो ये जमीन किसकी है?
भगवान का कब्ज़ा है, की उनकी सत्ता खिसकी है?
एक बात बता दो की क्या हम रामगुलाम है?
जीने देना हलाल है की, की जीना हराम है?

उनकी अर्थी उठाई, जो दफनाये हुए से बड़े थे
कल तक यहीं रौब में उफनाये हुए से खरे थे!
मेरी पूछी सवालों का जवाब कल देना था उन्हें
बेखेत को मजदूरी, किसान को हल देना था उन्हें!

तो याद में आप अपने, महल छोर के जाना
बेघर इस धरती को और विकल छोर के जाना
पर मैं यहाँ कुछ छोर कर नहीं जाऊँगा, शायद
इसी उम्मीद में की सब-कुछ छोर कर जा रहा हूँ!

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