Wednesday, 12 October 2016

कलम थोरी पुरानी है

कलम थोरी पुरानी है चलेगी क्या?
उस बाज़ार से खरीदी है जहाँ अब इसकी जरुरत नहीं !
वहां का फैज़ चल बसा, वहां का मीर लुट गया
वहां अब शाम की वो बैठक नहीं होती
उस रास्ते में अब माशूक खरे नहीं दीखते
वहां अब कोई खुदा पर सवाल नहीं करता
वहां अब कोई जीने मरने की कसमे नहीं खाता
किसी खिरकी पे अब कोई कशिश नहीं है
की देखते देखते कोई शाम-ए-अलम तोरे
और लिखते लिखते कोई कलम|
उसी बाज़ार सी खरीदी है जहां इसकी जरुरत नहीं
कलम थोरी पुरानी है चलेगी क्या?

वहां अब होली बेरंग है और दिवाली बेनूर
रंग और नूर कहीं और जा बसे हैं
सेवइयां अब वहां जादा मीठी बनती है
तब जा कर कहीं लोगों की कमी पूरी होती है!
घरौंदे बनाने को अब चीज़ें कम पड़ती हैं
रंगोली की अब कोई निगरानी नहीं करता||
मैं यूँ ही मुर मुर कर देख लेता हूँ
पर अब वहां कोई आवाज़ नहीं देता|
अब अलार्म लगा कर उठता हूँ वहां
चिरियां अब कहीं और जा बसे हैं
खिरकी की कांच पे धुल जमी रहती है
बच्चे अब यहाँ खेला नहीं करते|
लोहे का ट्रंक जो बहुत जगह लेता था
माचिस के डिब्बे की तरह पड़ा है|
वह भूत जिसने माँ की इतनी मदद की
वह भी कहीं और जा बसा है|
शादी कार्ड के गणेश अब चैन से हैं
उन्हें टी.वी पर अब कोई नही लगाता !
लक्ष्मी, शिव सभी चैन से है
बेवक्त मांगों से अब उन्हें कोई नहीं जगाता!
उसी बाज़ार से खरीदी है जहाँ इसकी जरुरत नहीं!
कलम थोरी पुरानी है चलेगी क्या?

वहां बूढों को बच्चे बंनने का मौका नहीं मिलता
बच्चों को बच्चा बनने का मौका नहीं मिलता
पतंगों को चाँद की अभिलाषा नहीं है!
रूठें तो कोई मनाये ये आशा नहीं है
तर्क, वितर्क का कोई युद्ध नहीं दीखता
पीपल तो दीखता है पर बुद्ध नहीं दीखता|
धुल में सने हुए वो पाँव नहीं दीखते
बारिश भी है पर कागज़ के नाव नहीं दीखते
चाँद तो आता है हर रोज़ अभी भी
उसके तले मगर अब कोई ख्वाब नहीं आता
ख्वाब आते है तो बस की फिर सब वैसा हो
किसी कमरे से कोई जवाब नहीं आता!
मेरा गाँव अब शहर बन गया है
किसी की नींद किसी का सपना बन गया है
किसी का पराया किसी का अपना बन गया है
पर अब पूरा गाँव एक साथ जागता-सोता नहीं है
एक साथ पाता-खोता नहीं है
एक साथ हस्ता-रोता नहीं है
बाज़ार काफी बड़ा हो गया है
जहाँ गैर-जरूरती चीजें बिकती है
उसी बाज़ार से खरीदी है जहाँ इसकी जरुरत नहीं
कलम थोरी पुरानी है चलेगी क्या?





1 comment:


  1. मेरा गाँव अब शहर बन गया है

    किसी की नींद किसी का सपना बन गया है

    किसी का पराया किसी का अपना बन गया है

    पर अब पूरा गाँव एक साथ जागता-सोता नहीं है

    एक साथ पाता-खोता नहीं है

    एक साथ हस्ता-रोता नहीं है

    बाज़ार काफी बड़ा हो गया है

    सही है अब सभी गांव थोडा शहर बन गया है।
    भावपूर्ण पंक्तियाँ.....

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