जैसे-जैसे शहर से
दूर पहार की ओर हम जाते हैं, एक यात्रा शुरू
होती है| नैनीताल में बस अड्डे पर
उतर कर कई लोगों को निराशा हो सकती है| जिस शहर की कोलाहल से दूर लोग हिल स्टेशन पर आते हैं, उन लोगों की हवा, वातावरण ओर आम जनजाति से आकांक्षाए बढ़ जाती हैं| कई स्थान ऐसे हैं जहाँ टूरिस्ट को निराश ना करने के लिए
सहरीकरण को जबरन रोका गया है| एक मंझा हुआ शहरी
इस बात से निराश होता हैं क्योंकि उसे यह एक कारोबार दिखता है, वह अपने आप को एक बाज़ार मे बिकता देख भाग कर
दूसरे स्थान पर आया पर यहाँ भी वो ठगा महसूस कर रहा है | ठगा महसूस करना शहर का एक अहम हिस्सा है| दुबारा ग़लती ना करना, दुबारा शिकार ना बनना , इसी जालसाज़ी की भावना से ही आती है| यक़ीनन बस से उतरते यह भावना आती है, जब नैनीताल के माल रोड पर बड़ी इमारतें, रिस्ट्र्न्ट ओर अन्य अलग अलग जगह जो की एक
बसे-बसाए शहर की खूबी है, एक टूरिस्ट को
दिखती है तो वो परेशान हो जाता है| मैं भी हल्का निराश
हुआ पर एक आशा थी जो इन मामलो मे अपने आप को ग़लत साबित करने के जोश से आति है।
एक कमरा लिया। 500 रुप्ये मे।
बड़ी मेहनत के बाद एक कमरा मिला जिसे देख कर यह निश्चित ही कह सकते थे कि समय मे
कुछ पिछे आ गये है, मक्सद भी कुछ ऐसा हि था। जादा नहीं कुछ 10-15 साल पुराना रहा
होगा। नहा कर सैर करने निकला । 2-3 क्लिसे पॉइंट जैसे ल्वेर्स पॉइंट, जहाँ से कोई
कूदा था (नहीं कूदा तो किसी को धक्का दे दिया गया होगा) घुमने के बाद शाम में झील
में बोटिंग करने गया | झील का रास्ता पूछने में एक अनोखी घटना हुई, पास के ठेले वालों से पूछा की ‘लेक’ किधर है तो
उन्होंने ऐसे किसी जगह के अस्तित्व से साफ़ इनकार कर दिया , वहीँ मित्र ने पूछ दिया
की झील कहाँ है तो छोर कर आने को राज़ी हो गया | एक मित्र के पानी के डर के कारन वहीँ
झील की बाउंड्री पर कुछ देर बैठ कर बातें की| वाकई जलवायु परिवर्तन से बातों में
भी परिवर्तन आ जाता है | एक मित्र का कहना था की इतनी उचाई और ठण्ड में दिमाग में
कम खून पहुँचता है इस लिए जटिल बातें जादा नहीं होती! थोरा इस तथ्य और थोरी झील की
खूबसूरती के प्रभाव में हम भी कुछ देर शांत बैठे| नंदा देवी महोत्सव होने के कारण
बहुत ही शानदार मेला देखने को मिला , उन् के बिने हुए स्वेटर और टोपियाँ खरीदते
हुए घर पर आरामकुर्सी पर बैठी हुई , बुनाई करती हुई एक बूढी औरत की प्रतिमा उभरी,
हालाँकि अब बुनाई होती नहीं, यह और ऐसी कई तस्वीर रहस्मय ढंग से आँखों के सामने
आती है| भूत से परे, वर्तमान से अनजान ये जो तसवीरें हैं इनका कोई अता-पता नहीं |
कुछ टोपियाँ खरीदी और मित्रों ने कुछ की तस्वीर खीच ली, शायद घर जा कर उसी बूढी
औरत से बुनने की फरियाद करेंगे | कमरे पर वापस आ कर एक पतली सी रजाई ओढ़ कर लेटा,
मन तो बहार बैठ कर तारे गिनने का था पर वो कल तक रुक सकता था| बीते जनवरी में जो
रजाई मोर कर घर में रख दिया था वह जैसे बेमौसम ही निकल गया हो| २८०० क.म लम्बा और
३२०० क.म चौरे इस देश में ‘मौसम मेनू कार्ड’ कुछ ऐसा ही है | हजारों सालो की लेन-देन
और आवा-गमन में भी ये विविधता सर्वोपरि है|
सुबह नींद खुली| चेक
आउट का समय होने वाला था| नहा-खा कर निकला मुक्तेश्वर की ओर| पैदल होने के कारन
तिब्बती मार्किट में भी टेहेलने का मौका मिला | १०-१० रूपये में दानवीय आकार के
जैकेट ख़रीदे | उस दिन पहली बार यह कथन की ‘इंसान मुफ्त का कुछ भी ले लेता है ‘ पर
से विश्वास उठ गया| लोग बड़ी बारीकी से छांट छांट कर जैकेट खरीद रहे थे, यह तक
सुनाई दे रहा था की ‘ रंग तो नहीं जायेगा?’ , ‘तंग तो नहीं होगा?’, ‘पटरी पर से तो
नै उठा लाये हो?’|
हमने भी ३-४
हिप्पीनुमा जैकेट ख़रीदे और झील के किनारे वाले रस्ते से बस स्टैंड की और गए | झील
की आर में २-३ खुबसूरत तस्वीर भी खिचवाई| २ बजे एक सरकारी गाड़ी मुक्तेश्वर को जाती
है| ऑफ़ सीजन होने के कारण बस में हम तीनो को छोर कर सारे क्षेत्रीय लोग थे और लगभग
सभी एक दुसरे को जानते थे |
किसके
चाचा किस अस्पताल में किस डॉक्टर से इलाज हो
रहा है से किसका बच्चा किस कक्षा में गया तक बातें होती रहीं, बस १५ चलती थी और १
घंटे रूकती थी| रोड पे अंग्रेजी और हिंदी दोनों में चालकों के लिखे ज्ञान की बातें
लिखी थी जैसे ‘घर पे आपका कोई इंतज़ार कर रहा है’ इत्यादि, यात्रियों की घनिष्टता और
उनका चालक के प्रति प्रेम इन बातों की और अभिप्रेरणा कर रहा था|
यह बात बिना कहे जाती है की शहर में
यह घनिष्टता नहीं दिखती, यही इस बात का भी प्रमाण थ की हमारी यात्रा शुरू हो चुकी
है, शहर से दूर| वह माहौल निश्चित ही कुछ नया नहीं था, हम सभी इस घनिष्टता के
मैत्री रह चुके हैं पर अब उसके बिना जीने की आदत लग गई है| कम से कम लोगों और उनके
ज़िन्दगी में रूचि रखना खुश रहने का पर्याय बन चुका है| प्रतीत होता था की कुछ देर
और बस में बैठने के बाद लगभग सभी यात्रियों के बारे में कुछ न कुछ जानकारी मिल
जाती| उनकी रोचक सिकुरी हुई सामाजिक रचना में अगर मैं कुछ छोर रहा था तो वह थी
खिरकी से बाहर दिखने वाली हिमालय की कच्ची घाटियाँ , पर यह जिज्ञासा रास्ते में
घटती गई| पहारी क्षेत्र में यात्रा करने जाने वाले टूरिस्ट अक्सर खरे हो कर पहार
को निहारते हैं , मैं भी यही करने गया था| एक स्थिरता है इसमें, जो हमे आकर्षित
करती है| इस स्थिरता को हम अपने नौकरी, साथी, जीवनसाथी, बच्चों में खोजते हैं और
यह अंतहीन चेष्टा हमें पहारों तक ले आती है , पर अक्सर वहां भी हम निरंतरता ही
पाते है और लगता है की स्थिरता एक क्षल है| पहार नहीं उनसे निकलने वाली नदियाँ
सत्य है, उनमे निरंतरता है, भले ही उनकी जननी स्थिर है| उस बस में बैठे उन लोगों
की घनिष्टता में जो स्थिरता थी वो उनके निजी जीवन की निरंतरता से काफी भिन्न थी,
शायद निजी जीवन उनका अपना-अपना सत्य है, नदियों की तरह और यह घनिष्टता मिथ्या,
स्थिर क्षमाहीन कच्ची पहरिओं की तरह , पर उस निजी जीवन की जननी! सच ही यह ख्याल
आया की जो खोजते यहाँ आया हूँ वो तो असल में वहीँ छोर आया हूँ, वो स्थिरता जो
हमेशा से वहीँ थी, लोगों के बिच| हाँ, यह ख़ुशी थी की उनकी जननी, यह पहार आज
प्रत्यक्ष है और सवाल बहुत कम, इतने जवाब उसने बिना कहे ही दे दिए|
५ बजे बस मुख्तेस्वर
पहुंची| दिल्ली से ही यहाँ के मशहूर सिद्ध शिव मंदिर के बारे में सुनता आया था सो
सबसे पहले वही गया| मंदिर वाकई ही बहुत खूबसूरत है| मंदिर के सबसे ऊँचे स्थान से
उस जगह के नाम का औचित्य साबित हो रहा था ‘मुक्तेश्वर’, सामने हिमालय, शिव, सत्य
और मुक्ति|
मंदिर में कई तरह के
निर्देश थे जैसे ‘भगवन के कार्य में बाधा न डाले’, ‘यह घुमने का स्थान नहीं है’, ‘अपना
समय व्यर्थ न करे’, इत्यादि| मेरे मित्र को संदेह हुआ की पुजारी चरस का सेवन करता
है, दुसरे ने टोका की सिद्धि का नशा भी कुछ ऐसा ही होता है! इसपर पहले ने बड़ा
अफ़सोस जताया की न जाने शहर में सिद्ध होने के कितने ही मौके छोर दिए और कितने ही
सिद्ध पुरुषों का नाहक ही अपमान कर दिया|
रात काफी हो चुकी थी और अभी
तक कमरा भी नहीं लिया था| थोरा दूर चलने के बाद कमरे दिखे| आबादी कम होने के कारन
बहुत ही मोहक शांति फैली हुई थी| इसकी आदत न लग जाये इस लिए कान पे हाथ रख लिया
जैसा की दिल्ली में शोर सुन कर करता आया था!
८०० रूपये में
कमरा मिला जो की बिलकुल पहारियों की ओर खुलता था| हालाँकि रात को दिख तो नहीं रहा
था पर उनके होनेमात्र का ख्याल ही पुरे अनुभव के सामान था| उस दिन की अपनी खुद की
कही बात पर हँसी आती है, मैंने यह विचार रखा की खूबसूरती आंख मात्र में होती है,
हो सकता है इस संसार में कुछ भी न हो, पर हम अपनी कल्पना के अनुसार सब कुछ देख रहे
हैं, खूबसूरती भी, हमारे दिमाग से बाहर कुछ भी नहीं है| हालाँकि मेरा मित्र दिमाग
में खून कम पहुचने के कारण जटिल ख्यालों से परहेज कर रहा था, पर इस बात का जवाब
उसने सर पर खून चदा कर दिया| जवाब वही तो था जो वास्तविक है, उसका, आप सब का, आज
मेरा भी, पर उस दिन यह ख्याल क्यों आया मुझे नहीं पता|
उस दिन बाहर बैठ तारे देखे, हवा भी
काफी मीठी थी, चाँद भी टंगा था| उस समय को शायद वहीँ जी गया और उसमे से कुछ बचा
नहीं पाया ,कभी, जिससे वापस ला कर अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाऊ! भला उसमे से
कोई कैसे कुछ चुरा सकता है जो कभी ख़त्म ही नहीं होता? उससे तो बस चुना जा सकता है
अपना हिस्सा, वह समय, वह पल जो की कभी इतना स्थिर ही नहीं हुआ की अनुभव बन के
शब्दों में आ जाये|
सवेरे बिस्तर पे उठा पर रात को कब उठ कर भीतर आया याद नहीं | रात को पहारी आलू की सब्ज़ी खाइ, याद है, जिसकी
अनुशंषा फ़ोन कर के पिताजी ने की थी| वाकई नशा था उस जगह में और मुक्ति कितनी
क्षणिक हो सकती है इसका एहसास भी| वह मुक्ति ही थी उस दिन जिसे मैं भूल गया, बिन
किसी ग्लानी और अफ़सोस के|
नास्ता और कमरे का
हिसाब चुकता कर के वहां के भी निकलने का अनुरोध किया मित्रों से| वाकई निरंतरता
में एक अलग तरह की खूबी सीख के लौटा हूँ, जिस कारण सफ़र करने में आनंद आ रहा था|
रानीखेत जाने पे समझौता हुआ| सीधी बस नहीं मिलती है , पहले मुक्तेश्वर से भवाली
फिर वहां से रानीखेत| भवाली को भी जाने वाली बस कुछ आधे घंटे से छुट गई| यह ख्याल आया
की निरंतरता पे अडिग रहने में निश्चितता को तो नहीं छोर रहा हूँ पर सकारात्मकता
इतनी प्रबल थी की भवाली के १० क.म पहले तक के लिए छोटी गाड़ी मिल गई| भलमानसता के
उदाहरण कई है, हर जगह हैं, नज़र तब आते हैं जब हम खुद वेदनिय हालत में हों| पहार
क्षमाहीन है और क्षेत्रीय लोगों को छोर दें तो हमारे जैसे लोग हमेशा वेदनीय हैं!
इस हालत में बिना आपकी मानवीय गरिमा को ठेस पहुचाये जिस भलमानसता की मै बात कर रहा
हूँ वह हममे इसे आगे कायम रखने की भावना पैदा करता है| यह भलमानसता पहारी जनजाति
में निहित है| पहार अगर किसी को बीमार कर दे तो उन लोगों से कारगर दवा और कोई नहीं
है | जब हम शहर में असंवेदनशील जीवन जीते हैं, दावा-दारू नज़र नहीं आती, केवल
बीमारियाँ और बुराइयाँ, हो न हो, इस सफ़र में जितनी संवेदना मुझे मिली है उसका कुछ
अंश ही शहर को जीने लायक बना सकता है|
कई लोगों की छोटी-छोटी
मदद से हम रानीखेत पहुचे| मात्र ३०० रूपये में कमरा ठीक कर हम घुमने निकल गए| वहां
पहुँचते पहुचते अपने आप से जादा वहां के लोगों पे भरोसा था| मैं उस बच्चे की तरह
था जिसे उसके प्रियजन हवा में उछाल देते हैं और वह इस उल्लास में हँसता-खिलखिलाता
रहता है की गिरने पर संभाला जायेगा| मैं पहार की गोद में कम पहारियों की गोद में
जादा रहा| रानीखेत फ़ौज का सेटलमेंट है सो आर्मी संग्रहालय देखने का मौका मिला |
रानी झील के रस्ते कुछ दूर चलने के बाद चीतों की चेतावनी पढ़ कर वापस लौटने का विचार
आया पर कुछ दूर और आगे बढे, पुरे रास्ते देवदार के पेरों के बीच से आने के बाद
थकान मिट चुकी थी| कमरे पे लौट कर हिमालय की चोटियाँ देखने की उत्सुकता थी सो झील
देख कर वापस लौटे| हालाँकि बाज़ार में भीर काफी थी पर कोलाहल नहीं, खरे होकर हिमालय
को ताकने की आकांशा यही सिद्ध हुई!
नैनीताल की ताल,मुक्तेश्वर की मुक्ति
और रंनिखेत के देवदार, इन सबके बिच में एक समाज जो दिल्ली से मात्र ३०० क.म दूर
है,सड़क से, पर कभी सोचने बैठा हूँ तो दूरी बहुत है, दायरा काफी गहरा है| क्या कुछ
बदल जाता है ३०० क.म में? हवा, पानी, इंसान या इंसानियत?
सच तो दोनों ही
हैं पर मुझे पुराना और स्थिर वाला ज्यादा पसंद है| फिर क्यों मैं इस नए, बदलते और
दूर के सच के पास वापस आ गया? मुक्तेश्वर मंदिर के बाहर लिखी एक कहानी याद आती है:
“ एक साधु बड़े ही
असंवेदनशील, स्वार्थी लोगो के गाँव में एक दिन ठहरता है| अगले दिन जाते वक़्त कहता
है की तुम सब यहीं रहो , कहीं जाना मत| अगले दिन एक बड़े ही सभ्य और संवेदनशील गाँव
में जाता है और लौटते वक़्त कहता है , जाओ घुमो, कहीं और बसों! तात्पर्य पूछे जाने
पर कहता है की अच्छाई फैलनी चाहिए परन्तु बुरे जहाँ है वहीँ रहे तो अच्छा है!” |
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