Wednesday, 12 October 2016

चल चलें

चल चलें वापस उस गली में जहाँ
सरकों पे हम जादू बिखेरते थे
चुन लेते हैं गुम हुए वो लम्हे
वक़्त को फुसलाकर , थोरा समझाकर|

रंगीन शाम के गोद में वो लम्हे
अलसाई से मुस्की इठलाते होठ पर
वो चाय के चुस्की और हाथ रिमोट पर
आओ लौट चलें वापस उनकी गोद में

यादों की आबरू बचाए रखे है समय
उसे मेहरबानी दे कर, चुरा लेते है
ट्रेन बस में उनकी तस्करी कर के
वापस ले चलते है उन्ही गलियों में!

जहाँ बातें ही बातें थी, थकती थी
हवाएं जिनसे टकरा कर! कुछ उदास था
तो बस दूर दीखता एक खंडहर| आज दूर हैं हम
क्या बस उसे आलीशान बनाने के लिए?

 कल पर टाल देते थे जिन पेंचीदा सवालों को
रुख बदल गया है हमारा, जब से वह आज बने है!
शिकार का जैसे मौत की तरफ, घने जंगल में
रवैया बदल जाता है जब रोज़मर्रा बन जाती है|

आलिशान जो है वो तो बनता रहेगा
चलो वापस हवाओं में महल बनाते हैं!
 बारिश का पानी , उसकी ही मिट्टी
सर्द की वो आग, उनमे पिघलते शाम की हवा
छोटा ही सही, चलो कुछ अपना बनाते हैं|
चल ठहरे उसी गली में, ठहरती है जहाँ
रात सहमी सी, अपने आप से बच के |

कोई नशा नहीं जो पुरानी बातें याद आ रही हैं|
रंज है अगर और थोरा नशा भी तो,
तो ताल्लुकात नई, आज की बातों से है
गुमनाम शामों और सन्नाटे भरे रातों से है|
आईने में परा अपने आज की मुलाकातों से है
श्याही में सने , कागजों में लिपटे जज्बातों से है|
रंज है अगर और थोरा नशा भी
तो इनके न ख़तम होने के ख्यालों से है|

बदल तो गए है हम भी लेकिन
सारा दोष चढ़ते वक़्त को ही क्यूँ दें?
न जाने के बहाने देते देते
अब न आने के बहाने देने लगे हैं!
अब बस आसरा है तो एक अंत का
जो सुख दुख की एक रहस्यमय युद्ध में
एक दुसरे को मारते, सुन्य की और अग्रसर
पर, उससे पहले , चल चले उन्ही गलियों में..







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